Wednesday, August 5, 2020

धनतेरस के फायदे

क्या है धनतेरस

कार्तिक माह (पूर्णिमान्त) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र-मंन्थन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है। भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।

धन्वन्तरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस अवसर पर लोग धनिया के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं। दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं।

धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है; जिसके सम्भव न हो पाने पर लोग चांदी के बने बर्तन खरीदते हैं। इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह [[चन्द्रमा] का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में सन्तोष रूपी धन का वास होता है। संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है, सुखी है, और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं। उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मीगणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हैं।

धनतेरस के फायदे

इस बार धनतेरस  मान्यताओं के अनुसार, धनतेरस के दिन खरीदारी करना शुभ माना गया है। इस दिन खरीदारी करने से घर में हमेशा सुख-शांति और समृद्धि आती है और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद भी बना रहता है। इस दिन खरीदारी करने से सालभर घर में खरीदी गईं चीजें शुभ फल देती हैं।



 


Wednesday, July 15, 2020

संत रामपाल जी महाराज की संघर्ष यात्रा।

संत रामपाल जी महाराज
     संत रामपाल जी महाराज का जन्म 8 सितंबर 1951 को हरियाणा प्रान्त के  सोनीपत जिले में गाँव धनाना में हुआ।
अपनी पढ़ाई पूर्ण करने के उपरांत हरियाणा प्रान्त में जूनियर इंजीनियर की पोस्ट पर 18 वर्ष कार्यरत रहे।
 उन्होंने 1988 में परम् संत रामदेवानंद जी महाराज से दीक्षा प्राप्त की और सत्यभक्ति में पूर्णता सक्रिय हो गए तथा परमात्मा का साक्षात्कार किया।
संत रामपाल जी महाराज को 37 वर्ष की आयु में नाम दीक्षा प्राप्त हुई थी। और यही उनका आध्यात्मिक जन्म था।



संत रामपाल जी महाराज द्वारा नाम उपदेश
सन् 1993 में स्वामी रामदेवानंद जी महाराज ने आपको सत्संग करने की आज्ञा दी तथा सन् 1994 में नामदान करने की आज्ञा प्रदान की। भक्ति मार्ग में लीन होने के कारण जे.ई. की पोस्ट से त्यागपत्र दे दिया जो हरियाणा सरकार द्वारा 16.5.2000 को पत्र क्रमांक 3492-3500, तिथि 16.5.2000 के तहत स्वीकृत है। सन् 1994 से 1998 तक संत रामपाल जी महाराज ने घर-घर, गांव-गांव, नगर-नगर में जाकर सत्संग किया। बहु संख्या में अनुयाई हो गये। साथ-साथ ज्ञानहीन संतों का विरोध भी बढ़ता गया


संत रामपाल जी महाराज का संघर्ष
जब 1994 में संत जी को एक सत्संग के दौरान स्वामी रामदेवानंद जी महाराज ने आगे बुलाया और अचानक कहा कि रामपाल आज से नाम दीक्षा आप दोंगे तब संत जी कुछ समझ न पाए और सोचने लगे कि इतना महत्वपूर्ण कार्य मेरे ऊपर लेकिन स्वामी रामदेवानंद जी महाराज को तो पता था,, यही वह महापुरुष बनेगा जो आगे इस सत्यज्ञान को ले जाएगा। अपने पूज्य गुरुदेव रामदेवानंद जी महाराज के सतलोक जाने के उपरांत रामपाल जी महाराज का संघर्ष प्रारंभ हुआ, वह जे. ई की पोस्ट पर कार्यरत थे,, हप्ते में एक दिन रविवार का अवकाश रहता था तब गाँव-गाँव जाकर सत्संग किया करते थे,, किसी भक्त के घर। चूँकि मालिक का ज्ञान भी आगे ले जाना था और कुछ अनुयायी भी बढ़ने लगे तो परमात्मा के आदेशानुसार उन्होंने जे. ई की नोकरी से त्यागपत्र दे दिया,, इसके उपरांत नगर-नगर सत्संग किया कि संख्या में श्रदालु भी बढ़ने लगे साथ साथ काफी विरोध भी हुआ,, लेकिन सत्यज्ञान नही रुका आगे चलकर 2006 में करोंथा आश्रम की स्थापना की । संत जी ने महृषि दयानंद की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश की अज्ञानता का प्रर्दापास किया और सच्चाई को बताया जिससे आर्य समाजी संत जी के विरोधी ही गए। और संत जी को खत्म करने को उतारू हुए और अंत करोंथा कांड करा, अनेक झूठे बेबुनियाद मुकदमे लगाए पर यह सत्यज्ञान नही रोक पाए नए आश्रम बरवाला की स्थापना की और फिर से सत्यज्ञान प्रारम्भ किया,, विरोधियो की वही गतिविधियां रही और 2014 में फिर बरवाला कांड हुआ और अनेक झुटे मुकदमे लगाए,,और जेल भेज दिया, लेकिन लाखो श्रदालुओ का विश्वास अब भी नही डगमगा और अब भी हमारा संघर्ष जारी है अंनत सत्यज्ञान सत्यराह की विजय होगी, और गुनहगार कटघरे में होंगे।।




अधिक जानकारी के लिए देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 तक।। 
पढे पुस्तक ज्ञान गंगा जीने की राह।

Wednesday, July 8, 2020

नवरात्री पूजा

क्या है नवरात्रि पूजन
यह हिन्दुओ का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है जिसे वे हर वर्ष बड़े हर्ष उल्लास के साथ 10 दिन तक मानते है।
यह देश के कोने कोने में मनाया जाता है।
इन दिनों में देवी दुर्गा की पूजा अर्चना होती है। और कई लोग इन दिनों में उपवास भी रखते हैं।
व कुछ लोग कलश स्थापना करते है । सामान्य भाषा में इसे नोराते कहते है जिसमे 9 दिन तक विभिन्न देवियो की पूजा होती है।
देवी दुर्गा के विभिन्न रूप जैसे शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी चन्द्रघण्टा आदि की पूजा अर्चना होती है।


अंतिम 10 दिन में मा दुर्गा की विदाई और मूर्ति विसर्जन होगा।।

नवरात्रि क्यो मनाते है।
इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं है कुछ लोग देवी पुराण का हवाला देते है कुछ और। साल में नवरात्रे 4 बार होते है जिसमे साल में 2 बार मुख्य होते ही है।
साल के प्रथम मास चैत्र में पहली नवरात्र होती है, फिर चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्र पड़ती है। इसके बाद अश्विन माह में में प्रमुख शारदीय नवरात्र होती है। साल के अंत में माघ माह में गुप्त नवरात्र होते हैं। इन सभी नवरात्रों का जिक्र देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। हिंदी कैलेंडर के हिसाब से चैत्र माह से हिंदू नववर्ष की भी शुरुआत होती है, और इसी दिन से नवरात्र भी शुरू होते हैं, लेकिन सर्वविदित है कि चारों में चैत्र और शारदीय नवरात्र प्रमुख माने जाते हैं। एक साल में यह दो नवरात्र मनाए जाने के पीछे की वजह भी अलग-अलग तरह की है।


देवी पुराण के अनुसार दुर्गा पूजा सही है या गलत

देवी भागवत पुराण के स्कंद 7, पृष्ठ 562 मे देवी द्वारा हिमालय राज को ज्ञान उपदेश मे दुर्गा जी स्वयं किसी और भगवान की पूजा करने की बात करती हैं।
अब यहां यह साफ तौर पर स्पष्ट है कि इन विद्वानों, संतो के जगदंबिका की पूजा अर्चना के बारे में वर्णित कथन को देवी दुर्गा के श्रीमद् देवी भागवत पुराण के स्कंद 7, पृष्ठ 562 मे कहे गये कथन गलत साबित करते है जहा देवी दुर्गा कहती हैं कि मेरी पूजा को भी त्याग दो और सब बातों को छोड़ दो, केवल ब्रह्म की साधना करो।
इससे ये प्रमाणित है कि सतयुग के "वृहत संतों" को भी परमेश्‍वर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी ।

और अधिक आद्यात्मिक जानकारी के लिए देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 बजे तक।

Wednesday, July 1, 2020

उच्च शिक्षा के फायदे और नुकसान

उच्च शिक्षा के फायदे या नुकसान

उच्च शिक्षा सामान्य तौर पर सबको दी जाने वाली शिक्षा
से ऊपर किसी विशेष विषयो पर दी जाने वाली शिक्षा उच्च शिक्षा है। यह शिक्षा के उस स्तर का नाम है जो विश्वविधालयो महाविधालियो द्वारा दी जाती है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से यह ऊँचा स्तर है जो एच्छिकता पर निर्भर करता है।
यह शिक्षा का तृतीय स्तर है। इसके अंदर स्नातक परास्नातक वह व्यावसायिक एवं प्रशिक्षण आते है।


उच्च शिक्षा के लाभ 

बेहतर नौकरी मिलती है

हमारे देश में अधिकतर लोग जो उच्च शिक्षा लेते हैं उनका पहला लक्ष्य बेहतर नौकरी पाना होता है। साधारण स्नातक लोगों की तुलना में उच्च शिक्षित अभ्यर्थियों को अधिक महत्व दिया जाता है। नौकरियों में प्राथमिकता दी जाती है।

खुद का बिजनेस स्थापित करना

उच्च शिक्षा लेने का एक बड़ा कारण यह भी है कि सकुछ लोग खुद का बिजनेस स्थापित करना चाहते हैं। इसलिए भी वे उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। देश में कई इंजीनियर खुद की अपनी फैक्ट्री लगा देते हैं। कॉमर्स से पढ़ने वाले बहुत से स्टूडेंट्स अपनी खुद की फर्म खोल लेते हैं। डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाले बहुत से डाक्टर अपना खुद का निजी अस्पताल खोल देते हैं।


उच्च शिक्षा में बदलाव
  • इंजीनियरिंग, चिकित्सा तथा कानून के लिये वर्तमानं में स्थापित बहु नियामक संस्थाओं द्वारा भविष्य में निभाई जाने वाली भूमिका उन प्रमुख समस्याओं में शामिल हैं जिनका समाधान करना आवश्यक है। यशपाल समिति ने इन सभी को एक समिति के अंतर्गत लाने का सुझाव दिया था। 
  • इसके साथ ही अन्य पेशेवर संस्थानों जैसे- आर्किटेक्चर तथा नर्सिंग को भी इसमें शामिल किये जाने की आवश्यकता है। 
  • इसका लक्ष्य प्रत्येक वर्ग के लिये पाठ्यक्रमों में परिवर्तन करने और प्रत्येक विषय के  अध्ययन को प्रोत्साहित करने की पर्याप्त स्वायत्तता के साथ अकादमिक मानक निर्धारित करना होना चाहिये। 

Wednesday, June 24, 2020

आत्महत्या सही है या गलत।

आत्महत्या

क्या है आत्म हत्या
 आत्महत्या का सीधा मतलब जानबूझकर खुद को मारना या स्वयं की हत्या अपने ही द्वारा करना है  आत्महत्या है यदि गहनता में जाए तो इसके पीछे आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के कई कारण या परेशानियां मजबूरियां रहती है जिससे वह ऐसा कदम उठाता है समान्यतः कोई भी व्यक्ति खुद को नुकसान नही पहुचाता पर कुछ कारण ऐसे रहते है।।


आत्म हत्या के कारण

आत्महत्या के वैसे तो कई तरह के कारण रहते है फिर भी हम जितना समझते है उस हिसाब से या हमारे आस पास में हुई आत्महत्या का कारण हमें पता होता है। आत्महत्या का संपन्नता और विपन्नता से कोई सरोकार नहीं है यक्ति को कुछ मानसिक प्रॉब्लम है या अंदर ही अंदर कोई बात खाए जा रही हो उस स्थिति में भी यह कदम उठता कुछ ऐसी घटना ऐसी बाते जो उसके जीवन को झकझोर देती है किसी करीबी दिया धोखा या उसके द्वारा की बदनामी भी यह कदम उठाने
आत्माहत्या के कई कारण है जैसे 8
तनाव मानसिक रूप से ग्रस्त
डिप्रेशन जीवन मे हुई बुरी बातों से उसे लगता है कि जिंदगी नही जीना चाइए।
डिस्ट्रेट बच्चो को करियर बनाने के लिए तनाव डालना।



आत्महत्या सही है या ग़लत

पहली बात तो यह है कि आत्महत्या शब्द ही गलत है शरीर नष्ट होता है आत्मा नही सनातन धर्म के अनुसार रही बात शरीर के तो दूसरे जीवो को मारने पर भी दोष लगता है सजा का प्रावधान है तो स्वयं के जीवन को नष्ट करना भी बहुत बड़ा अपराध है। यह अनमोल मनुष्य जीवन बारबार प्राप्त नही होता जो भी कर्म बनने हे अच्छे बुरे वह इसी मनुष्य शरीर से बनते है फिर हम इस अनमोल जीवन को नष्ट क्यो करे वैसे इसी जीवन को ईश्वर की सत्य साधना में लगाए तो भक्ति लाभ तो मिलेगा ही साथ मे हम आत्मा शरीर दोनो से प्रबल हो जाएंगे जिससे मनुष्य आत्म हत्या के बारे में सोच भी नही सकता आत्मा हत्या के जितने भी कारण रहे है वह सांसारिकता से जुड़े हम सांसारिकता को महत्व देने के बजाए ईश्वर को महत्व दे।।



आध्यात्मिक जानकारी के लिए रोज देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 जिसमे इस मनुष्य देह का वास्तविक उद्देश्य बताया जाएगा।।





Wednesday, June 17, 2020

जन्माष्टमी


जन्माष्टमी श्री कृष्ण का जन्मोउत्सव है, मतलब उनका जन्म आज हम जानेगे, की वास्तव में नाशवान प्रभु को है और अविनाशी कौन है।




कोन है अविनाशी परमेश्वर
यदि हम बात करे भगवान श्रीकृष्ण की तो वे विष्णु के अवतार माने जाते है, त्रिलोकी नाथ प्रभु है।
और यह जन्म-मरण के अंतगर्त आते है। श्री कृष्ण की जीवनी में स्वयं वे माँ के गर्भ से जन्म लेते है। और अंत मे इनकी मृत्यु भी एक भील के विषाक्त तीर से प्रारब्ध के अनुसार होती है।
श्री देवी महापुराण में एक प्रकरण है अद्याय 5 स्कंद 3 पृष्ठ 123 पर महाभाग विष्णु , देवी दुर्गा की स्तुति करते हुए कह रहे है, है जगत जननी प्रकृति सनातनी देवी यह सारा संसार तुम्ही से उद्भाषित है में, बर्ह्म विष्णु शंकर हमारा तो आविर्भाव(जन्म) और तिरोभाव(मृत्यु) हुआ करती है मतलब साफ है कि यह नाशवान प्रभु है।
वास्तव में अविनाशी परमेश्वर
वास्तव में अविनाशी परमात्मा कबीर परमेश्वर है वेदों में उन्हें कविर्देव कहा है। जो सबका धारण पोषण करता है ।
और उनके महापुरूषों की वाणी प्रमाणित करती है कि साहेब कबीर ही अविनाशी परमात्मा है।
 मलूक दास जी की वाणी
           चार दाग से सतगुरु न्यारा अजरो अजर शरीर ।
          कोई गाढ़े कोई अग्नि जरावे ढूंढा ना पाया शरीर।
         
   

श्री कृष्ण और परमेश्वर कबीर की लीलाए
श्री कृष्ण की लीला में एक प्रकरण है, जब उनके घनिष्ट मित्र सुदामा जी उनसे मिलने गए तब वह अपने परम मित्र के लिए एक मुट्ठी चावल लेकर गए श्री कृष्ण ने प्रेमपूर्वक उन्हें खाकर सुदामा के लिए उसके बदले एक सुंदर महक बनवा दीया।

वही परमेश्वर कबीर जी ने तैमूर लंग को एक रोटी के बदले सात पीढ़ी तक का राज्य दे दिया वास्तव में अविनाशी परमेश्वर के लिए सर्व सम्भव है।



 पांडवो का यज्ञ

श्री कृष्ण जी के मौजूद रहते हुए भी पांडवो का अश्वमेव का यज्ञ पूर्ण न हुआ शंख न बजा ऐसे में द्वापर युग मे आए करुणामय नाम से कबीर परमेश्वर ने अपने शिष्य सुपच शुदर्शन के रुप में आकर यज्ञ में भोजन प्राप्त किया उसके उपरांत वह शंख इतना जोर से बजा की तीन लोक तक उसकी आवाज गई और वह यज्ञ पूर्ण हुआ।। 



वास्तव में श्रीकृष्ण उर्फ विष्णु जी से ऊपर भी कोई भगवान है जो सर्वोच्च है उसकी शक्ति के सामने सर्व शक्ति फीकी है वह गीता के अनुसार उतम पुरुष है अद्याय 15 के श्लोक 17 व उसे सच्चिदानंद धन ब्रह्म भी कहा है और अद्याय 18 के श्लोक 62 में उसकी साधना से उसकी की कृपा से वह शास्वत परमधाम प्राप्त हो सकता है।। 

अधिक जानकारी के लिए देखे साधना tv रोज शाम 7:30 से 8:30 बजे तक। 

Tuesday, June 9, 2020

Bible knowledge

Bible

पवित्र बाइबल के अनुसार परमात्मा का स्वरूप


परमेश्वर ने 6 दिन में सृष्टि का सृजन किया । इसमें उन्होने  अपने स्वरुप की भी जानकारी दी है । की परमेश्वर कैसे है 
6 दिन मनुष्य और प्राणी तब पिता परमेश्वर ने कहा कि हम मनुष्य को अपने स्वरूप और अपनी समानता अनुसार बनाएगे जो जमीन पर रेंगने वाले जन्तुओ पक्षियों आदि पर अधिकार रखे मारे नही।
फिर परमेश्वर ने मानव को अपने स्वरूप अनुसार रचा। और नर और नारी करके उत्पन्न किया सृष्टि की।


पवित्र बाइबल के अनुसार मनुष्य के आहार।
पिता परमेश्वर ने मनुष्य के खाने के लिए बीजदर पौधे जितने भी है छोटे बड़े सब दिए वनस्पति फल इत्यादि।
जन्तुओ पर अधिकार रखने को कहा उनको मारने के लिए आदेश नही दिया।


आदम और हव्वा

आदम और हव्वा स्त्री और पुरुष थे । जिनको प्रारम्भ में अच्छे बुरे का ज्ञान नही था। परमेश्वर यहोवा में उन्हें अपने बाग में रखा था, तथा कहा कि इस बाग के सारे फल तुम खा सकते है, इन बीच वाले वृक्ष का फल मत खाना  क्योकि उनको डर था कि, उन वृक्ष का फल खाकर ये हम में से एक नही हो जाए।  नित्य की तरह वे बाग के दूसरे फल खाते थे, लेकिन एक सर्प ने जब हव्वा को उकसाया की वह फल खाने से अच्छे और बुरे का ज्ञान होता है, तब हव्वा ने वह फल थोड़ा स्वयं खाया और आदम को खिलाया,, जिससे उन्हें भले बुरे का ज्ञान हुआ उन्हें एक दूसरे से लज्जा आने लगी क्योकि वह नंगे थे। तब यहोवा परमेश्वर आता है और उनको आवाज लगाता है,, तब वह छुप जाते है  और कहते है हम नंगे है,, यहोवा परमेश्वर का पता चल जाता है कि उन्होंने भले-बुरे का ज्ञान कराने वाला फल खा लिया,, तब वह दोनों के लिए केले की छाल वाले वस्त्र बनाते है।

तब उस काल प्रभु ने आदम और हव्वा को जीवन के वृक्ष वाला फल खाने की सजा दी। और कहा कि अब तुम्हे पेट भरने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ेगा। और औरत हव्वा को श्राप दिया कि तू हमेशा आदमी के पराधीन रहेगी।।

अधिक जानकारी के लिए देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 तक।

धनतेरस के फायदे

क्या है धनतेरस संपादित करें कार्तिक  माह (पूर्णिमान्त) की  कृष्ण पक्ष  की  त्रयोदशी  तिथि के दिन  समुद्र-मंन्थन  के समय  भगवान धन्वन्तरि  अम...