जन्माष्टमी श्री कृष्ण का जन्मोउत्सव है, मतलब उनका जन्म आज हम जानेगे, की वास्तव में नाशवान प्रभु को है और अविनाशी कौन है।
कोन है अविनाशी परमेश्वर
यदि हम बात करे भगवान श्रीकृष्ण की तो वे विष्णु के अवतार माने जाते है, त्रिलोकी नाथ प्रभु है।
और यह जन्म-मरण के अंतगर्त आते है। श्री कृष्ण की जीवनी में स्वयं वे माँ के गर्भ से जन्म लेते है। और अंत मे इनकी मृत्यु भी एक भील के विषाक्त तीर से प्रारब्ध के अनुसार होती है।
श्री देवी महापुराण में एक प्रकरण है अद्याय 5 स्कंद 3 पृष्ठ 123 पर महाभाग विष्णु , देवी दुर्गा की स्तुति करते हुए कह रहे है, है जगत जननी प्रकृति सनातनी देवी यह सारा संसार तुम्ही से उद्भाषित है में, बर्ह्म विष्णु शंकर हमारा तो आविर्भाव(जन्म) और तिरोभाव(मृत्यु) हुआ करती है मतलब साफ है कि यह नाशवान प्रभु है।
वास्तव में अविनाशी परमेश्वर
वास्तव में अविनाशी परमात्मा कबीर परमेश्वर है वेदों में उन्हें कविर्देव कहा है। जो सबका धारण पोषण करता है ।
और उनके महापुरूषों की वाणी प्रमाणित करती है कि साहेब कबीर ही अविनाशी परमात्मा है।
मलूक दास जी की वाणी
चार दाग से सतगुरु न्यारा अजरो अजर शरीर ।
कोई गाढ़े कोई अग्नि जरावे ढूंढा ना पाया शरीर।
श्री कृष्ण और परमेश्वर कबीर की लीलाए
श्री कृष्ण की लीला में एक प्रकरण है, जब उनके घनिष्ट मित्र सुदामा जी उनसे मिलने गए तब वह अपने परम मित्र के लिए एक मुट्ठी चावल लेकर गए श्री कृष्ण ने प्रेमपूर्वक उन्हें खाकर सुदामा के लिए उसके बदले एक सुंदर महक बनवा दीया।
वही परमेश्वर कबीर जी ने तैमूर लंग को एक रोटी के बदले सात पीढ़ी तक का राज्य दे दिया वास्तव में अविनाशी परमेश्वर के लिए सर्व सम्भव है।
पांडवो का यज्ञ
श्री कृष्ण जी के मौजूद रहते हुए भी पांडवो का अश्वमेव का यज्ञ पूर्ण न हुआ शंख न बजा ऐसे में द्वापर युग मे आए करुणामय नाम से कबीर परमेश्वर ने अपने शिष्य सुपच शुदर्शन के रुप में आकर यज्ञ में भोजन प्राप्त किया उसके उपरांत वह शंख इतना जोर से बजा की तीन लोक तक उसकी आवाज गई और वह यज्ञ पूर्ण हुआ।।
वास्तव में श्रीकृष्ण उर्फ विष्णु जी से ऊपर भी कोई भगवान है जो सर्वोच्च है उसकी शक्ति के सामने सर्व शक्ति फीकी है वह गीता के अनुसार उतम पुरुष है अद्याय 15 के श्लोक 17 व उसे सच्चिदानंद धन ब्रह्म भी कहा है और अद्याय 18 के श्लोक 62 में उसकी साधना से उसकी की कृपा से वह शास्वत परमधाम प्राप्त हो सकता है।।
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