Wednesday, May 20, 2020

प्राकृतिक आपदाएं।

प्राकृतिक आपदा
प्राकृतिक आपदा का प्राकृतिक खतरे का परिणाम होती है। वह परिस्थियां जो मानव गतिविधियों को बाधित करे या उनके लिए खतरा बने, जैसे भूकम्प ज्वालामुखी भूस्खलन बाढ़ एस्टरॉयड यह आपदाए मानवीय जाति वह पर्यावरण के लिए भी नुकसान दायक है,, कुछ आपदाए मानव के प्रकृति के साथ किए अमानवीय व्यवहार से आती है,, यह प्राकृतिक आपदाएं मानव जीवन को प्रभावित करती है।।


निम्न प्राकृतिक आपदाएं:-
भूकम्प
          जमीन की सतह का हिल जाना या उसके स्तर में कम्पन आना इसमे तीव्रता होगी उतना ही नुकसान होगा, बड़ी-बड़ी इमारतों का ढह जाना।

ज्वालामुखी
              ज्वाला से ही समझ आ जाता है यह आग से सम्बंधित है, धरती की सतह पर छिद्रों दरो से पृथ्वी  के अंदर से निकला गर्म लावा राख  गैस आदि का प्रज्वलित रूप में बाहर निकलना फटना ज्वालामुखी है।

भू-स्खलन
            धरती की सतह का अंदर धसना रिसना, भू-सतह का अंदर से खोखला हो जाना इसके कारण है, जिससे उस सतह पर बनाए मकानों का ढह जाना आदि मानवीय नुकसान होते है।।

बाढ़
     जल के फैलाव या पर्याप्त जल का किसी क्षेत्र में फेल जाना जिससे वहां रहने वाले लोगो को भारी नुकसान होता है,, किसी बांध का टूट जाना तेज बारिश तालाब झील नदी आदि का रिसाव जिम्मेदार कारक है।


ये कुछ प्राकृतिक आपदाएं है, जो असमय कभी भी आ सकती है, और मानवीय जीवन को क्षति पहुँचा सकती है,, ये आपदा पूरे मानवीय जीवन को भी समाप्त कर सकती है,
कारण जलवायु परिवर्तन मानवीय हस्तक्षेप भूगर्भीय हलचल बहुत से कारण है।। समय समय पर आकर इन आपदाओं ने सबको प्रभावित किया है।।

Wednesday, May 13, 2020

पर्यावरण और उसकी क्षति

पर्यावरण
सामान्यत पर्यावरण का अर्थ हमारे चारों और के आवरण से है। आवरण मलतब चारो और घिरा हुआ। इसके अंतगर्त समस्त रासायनिक भौतिक एव जैविक कारक समाविष्ट है।
पर्यावरण ही जीवन और जीवित रहने को तय करता है।


पर्यावरण का महत्व
हर जीव के लिए पर्यावरण महत्वपूर्ण है। पर्यावरण में वनस्पति हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। उन्ही के सहयोग से हम भी फलते-फूलते है। पर्यावरण में जल थल वायु अग्नि आकाश है
उसी से हमारा शरीर है। और अंत मे विलीन भी उन्ही में है।


पर्यावरण के नुकसान
पर्यावरण के नुकसान में सर्वप्रथम कारक मानव जनसंख्या बढ़ोतरी है और प्रकृति के खिलाफ उनका हस्तक्षेप है।
पृथ्वी पर मानव की अमानवीय गतिविधियां इसके नुकसान का प्रबल कारण है।
नुकसान के प्रमुख कारण
जनवर्द्धि से वनस्पति दोहन शहरो का विस्तार फिर नदी नालों के पानी का अशुद्ध होना कृषि के लिए वनों की कटाई ऐसे बहुत से प्रबल कारण है पर्यावरण नुकसान के।


Tuesday, May 12, 2020

भक्ति और नास्तिकता का भेद।

भक्ति

भक्ति का सीधा अर्थ है, सेवाभाव या भजना आपकी जिस इष्ट में रुचि है, उस पर आसक्त होना, भक्ति ही अमृतस्वरूप है, जिससे साधक को अपने कर्म अकर्म का ज्ञान होता है, अपने जीवन निर्वाह के उद्देश्य का ज्ञान होता है, अपने कर्तव्य का ज्ञान होता है।
अतः भक्ति का सीधा अर्थ अपने ईश्वर के प्रति अथाह प्रेम उसको उनके प्रति व्यक्त करना।


भक्ति की आवश्यकता
विशेषतौर पर भक्ति की आवश्यकता है, इस संसाररूपी भवसागर से पार होना अर्थात पूर्ण मोक्ष को प्राप्त करना, पूर्ण मोक्ष हेतु साधक को सच्चे गुरु और उसके प्रमाणित गुरु मंत्रो उसकी दीक्षा की आश्यकता होती है,, पूर्ण गुरु से उपदेश के उपरांत सच्चे परमेश्वर की भक्ति से साधक को सर्व लाभ होते है, और आजीवन भक्ति से अमृत्व (मोक्ष) प्राप्त होता है ।



नास्तिकता
नास्तिकता का सीधा अर्थ है, संसार को ईश्वर रहित मानना,
समस्त सद्ग्रन्थों में ईश्वर के साक्ष्य प्रमाणों को देखकर भी उसके अस्तित्व को अस्वीकार करना।
नास्तिक लोगो का मानना है कि अपना कर्म करो और खाओ उन्होंने सांसारिक भोगो को ही अधिकतर महत्व दिया है,  उन्हें मूल अमृत्व (मोक्ष) की परवाह नही।

अधिक जानकारी के लिए आप नित्य देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 तक ।।।





Thursday, May 7, 2020

एक मुस्लिम भक्त को कैसे मिले अल्लाह कबीर

 बोध कथा

भगत फरीद जी का जन्म मुसलमान धर्म में शेख कुल में हुआ। शेख फरीद बचपन में बहुत चंचल था। गली में खेलने जाता था तो बच्चों की पिटाई कर देता। उलहाने आते, माता दुखी हो जाती थी। माता ने विचार किया कि फरीद को खजूर बहुत प्रिय है। इसे नमाज करने को कहती हूँ। माता ने योजना अनुसार फरीद से कहा कि बेटा! अल्लाह की नमाज किया कर। फरीद बोला कि अल्लाह (प्रभु) क्या देगा? माता ने कहा कि अल्लाह खजूर देता है। फरीद बोला कि बता कब करनी है नमाज? माता जब घर के कार्य में व्यस्त होती थी तो फरीद बाहर भाग जाता था। माता ने वही समय नमाज के लिए बताया। एक चद्दर बिछा दी तथा कहा कि आंखें बंद करके अल्लाह खजूर दे, अल्लाह खजूर दे। ऐसे करते रहना। माता ने एक वृक्ष के नीचे चद्दर बिछाई और कहा कि जब तक तेरे ऊपर धूप ना आए आंखें बंद रखना और नमाज करते रहना। जब फरीद आंखें बंद कर लेता तो माता ताड़ वृक्ष के पत्ते पर खजूर रखकर चद्दर के एक कोने के नीचे रख देती थी। फरीद ने धूप आने पर आंखें खोली। देखा तो खजूर नहीं मिला। उठकर माता के पास आया। बोला आपने झूठ बोला, मैं कभी नमाज नहीं करूंगा। अल्लाह ने खजूर नहीं दिया। माता जी ने कहा कि बेटा! अल्लाह गुप्त रूप में सब कार्य करता है। चद्दर के नीचे देख, खजूर अवश्य मिलेगा। फरीद ने चद्दर उठाई तो सच में खजूर रखा था। खुशी-खुशी खजूर खाया। माता से कहा कि अब कब करनी है नमाज। माता बोली कि मैं बता दिया करूंगी जब नमाज करनी होगी। प्रतिदिन काम के समय चद्दर बिछा देती। फरीद आंखें बंद करके बैठ जाता। माता खजूर रख दिया करती। एक दिन माता जी खजूर रखना भूल गई। फरीद ने धूप आते ही आंखे खोली। खजूर (टटोली) खोजी। चद्दर के नीचे खजूर प्रतिदिन की तरह रखी थी। फरीद खजूर खाता हुआ घूम रहा था। माता विचार करने लगी कि आज मेरे से बड़ी गलती हो गई। फरीद अब कभी नहीं मानेगा। परेशान करेगा। फरीद खजूर खाता खाता माताजी के पास आया। माता ने पूछा कि बेटा! खजूर कहां से लाया? बालक फरीद बोला! मां अल्लाह तो नमाज के वक्त प्रतिदिन खजूर देता है। मां बोली कि सच बता। मैं सच बताता हूँ। देख! इस पत्ते में खजूर अल्लाह रखकर जाता है। माता को भी समझ आई कि यह सामान्य बालक नहीं है। बड़ा होकर फरीद घर त्याग कर एक फक्कड़ फकीर का शिष्य बनकर आश्रम में रहने लगा। वह फकीर (साधु) सिद्धि प्राप्त था। हुक्का पीता था। आश्रम में 7 शिष्य थे। प्रतिदिन एक सेवक सब सेवा करता था। गुरुजी का भोजन बनाना। तुरंत भोजन के तुरंत बाद हुक्का भर कर गुरु जी को देना। कपड़े धोना। शेख फरीद दिलोजान से गुरुजी की तथा आश्रम की साफ-सफाई की सेवा करता था। गुरुजी शेख फरीद की प्रशंसा करते थे जो अन्य शिष्यों को खटकती थी।
उन सब ने मिलकर शेख फरीद को गुरुजी की नजरों से गिराने का विचार किया। षड्यंत्र रचा कि बारिश का मौसम है। गुरुजी भोजन के तुरंत बाद हुक्का पीते हैं। यदि हुक्का भरने में देरी कोई शिष्य कर देता तो उसे डंडों से पीटता था। कई दिन तक सेवा से वंचित कर देता था। शेख फरीद कभी गलती में नहीं आए थे। एक दिन शेख फरीद ने भोजन बनाया। अग्नि प्रतिदिन की तरह तैयार रखी थी। भोजन गुरुजी को खिलाया। चिलम में आग रखने के लिए चुल्हे के पास गया। तो देखा आग बुझ चुकी थी। आग नहीं थी। गुरुजी नाराज न हो जाएं। इस भय से शेख फरीद दौड़ा दौड़ा गांव में गया जो कि एक आधा किलोमीटर की दूरी पर था। एक माई चूल्हे में अग्नि सुलगाकर रोटी बना रही थी।
शेख फरीद ने कहा, माई! आग दे। गुरुजी का हुक्का भरना है। हमारी आग बंद हो गई है। गुरु जी नाराज हो गए तो जीवन नर्क बन जाएगा। माई ने दुःखी होकर फूंक मार-मारकर अग्नि जलाई थी। मौसम बारिश का था। माई बोली कि आग आंखें फूटने से मिलती है। मैंने आंखें फुड़़वाकर अग्नि तैयारी की है। तू भी आंखें फुड़वा, तब आग मिलेगी। शेख फरीद ने अपनी एक आंख में चिमटा मारा। आंख निकालकर माई के पास रख दी और बोला कि लो माई! आंख फोड़ ली है। अब तो आग दे दो। वह औरत घबरा गई। उसे पता था कि वह फकीर सिद्ध पुरुष है। वह मुझे हानि करेगा। तुरंत चुल्हे से अग्नि निकालकर बाहर कर दी। शेख फरीद आग चिलम में रखकर दौड़ा। फकीर दो आवाज़ लगाता था। कहता था कि हुक्का लाओ। शिष्य का नाम पुकारता था। तीसरी बार तो डंडा लेकर मारने चलता था।
गुरुजी ने पहली आवाज लगाई। तब शेख फरीद आधे रास्ते में था। दूसरी आवाज लगाई, तब आश्रम में प्रवेश कर चुका । गुरुजी ने दूसरी बार कहा कि हे शेख फरीद! कहां मर गया। शेख फरीद बोला आ गया गुरुजी। शेख फरीद ने फूटी आंख पर कपड़ा बांध रखा था। गुरु जी को बताया कि बारिश की वजह से आश्रम में आग बुझ गई थी। दौड़कर नगरी से लाया हूं। गुरु जी को अंधेरे में कुछ कम दिखाई देता था। शेख फरीद की आंख पर कपड़ा बंधा देकर पूछा कि आंख को क्या हो गया? फरीद बोला कि कुछ नहीं गुरु जी। आपकी कृपा से सब ठीक है। गुरु जी ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया। सुबह वह औरत शेख फरीद की आंख एक मिट्टी के ढक्कन पर रखकर आश्रम लाई। फकीर जी से अपनी गलती की क्षमा मांगी। बताया कि आपका शिष्य कल शाम को आग लेने आया था। बोला माई आग दे दे। आश्रम की आग बुझ गई है। गुरु जी भोजन खाते ही हुक्का पीते हैं। हुक्का भरने में देरी हो जाने पर नाराज हो जाते हैं। कई दिन सेवा नहीं देते हैं। यदि गुरु जी नाराज हो गए तो मेरा जीवन नर्क बन जाएगा। महिला बोली कि मैंने बड़ी मुश्किल से आग तैयार की थी। मेरी आंखें धुँऐं से लाल हो गई थी। फूंक मार-मारकर परेशान थी। मैंने भगत को कह दिया कि आग आँखें फुड़वाकर आग बनती है। आंखें फुड़वा तब आग मिलेगी। इसने सच में चिमटे से आंख निकाल कर रख दी। बोला कि यदि गुरु जी नाराज हो गए तो आंखे किस काम की? यह आंँख मैं लेकर आई हूंँ। गुरु जी ने शेख फरीद को बुलाया। कहा कि आंख का कपड़ा खोल। कपड़ा खोला तो आंख स्वस्थ थी। परंतु कुछ छोटी थी। माई ने यह सब देखा तो गांव जाकर फकीर की प्रसिद्धि की कि बड़ा चमत्कारी साधु है। मेरे सामने आंख ठीक कर दी। गुरुजी ने शेख फरीद को सीने से लगाया। आशीर्वाद दिया कि तेरी साधना सफल हो।
गुरु जी की मृत्यु के पश्चात शेख फरीद ने आश्रम त्याग दिया। गुरुजी ने तप करने से मोक्ष बताया था। जैसा गुरु जी का आदेश था, शेख फरीद पूरी निष्ठा से पालन कर रहा था। 12 वर्ष तक तो कुएं में उल्टा लटक-लटककर तप किया। उस दौरान केवल सवामन (पचास किलोग्राम) अन्न खाया था जो नाम मात्र था। शरीर अस्थिपिंजर बन गया था। शेख फरीद कुछ देर कुएं से बाहर बैठता था। 1 दिन (कागों) कौओं ने उसे मृत जानकर उसकी आंखें खाने के लिए उसके माथे पर बैठ गए। शेष शरीर पर मास नहीं था। फरीद बोला! हे कौओ! आप मेरी दो आंखें छोड़कर शरीर का सारा मांस खा लो। मैं परमात्मा देखना चाहता हूंँ। इसीलिए मेरी आंखें-आंखें छोड़ दो। जब फरीद बोला तो कौवे उड़ गए। शेख फरीद रस्से से पैर बांधकर प्रतिदिन की तरह कुएं में लटक गया। परमात्मा कबीर जी एक जिंदा बाबा के वेश में कुएँ पर आए तथा रस्सा पकड़कर फरीद को कुएंँ से निकालने लगे। शेख फरीद बोला भाई! आप मुझे न छेडें। तू अपना काम कर, मैं अपना काम कर रहा हूं। परमात्मा बोले कि आप क्या कर रहे हो? फरीद बोला कि मैं परमात्मा का दर्शन करने के लिए घोर तप कर रहा हूंँ। परमात्मा ने कहा कि मैं ही परमात्मा अल्लाह अकबर हूंँ। फरीद बोला! भाई मजाक मत कर। परमात्मा (बेचून) निराकार है। वह मनुष्य मनुष्य रूप में नहीं आता। परमात्मा ने कहा कि आप कहते हैं कि परमात्मा निराकार है। दूसरी ओर कह रहे हो कि परमात्मा के दर्शन (दीदार) के लिए घोर तप कर रहा हूँ। कहते हैं धाम का और ज्ञान का तो चमका-सा ही लगता है। शेख फरीद ने चरण पकड़ लिए। तत्वज्ञान समझा। कबीर परमात्मा के द्वारा बताई साधाना करके कल्याण करवाया।
प्रिय पाठकों यह कथा एक ऐसे भगत की है जिसने परमात्मा को निराकर मानकर उसका दर्शन करने के लिए घोर तप किया। लेकिन कभी यह नहीं सोचा कि (निराकार) जिसका कोई आकार ही नहीं है उसका दर्शन होना असम्भव है।
अतः आप सभी से प्रार्थना है कि वर्तमान में इस पूरे विश्व में केवल संत रामपाल जी महाराज जी ही ऐसे संत हैं जिन्होंने सभी सद्गन्थों में प्रमाणित किया है कि परमात्मा साकार है। जो सतलोक में रहता है। आप जी संत रामपाल जी महाराज जी की शरण में आयें और अपने मानव जीवन कल्याण करवायें।
आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। साधना चैनल पर प्रतिदिन 7:30 से 8:30 बजे तक।

Wednesday, May 6, 2020

मीठी बात का कड़वा लगना

।।सुविचार।। 

जिस दिन आप बुरे विचारों उसके ऊपर अच्छे विचारों को रख देंगे, आपकी जिंदगी खुद-ब-खुद बेहतरीन हो जाएगी।

प्रस्तुत कहानी में दो पात्र हैं, दो मकोड़े। एक चीनी के गोदाम में रहता था, दूसरा नमक के गोदाम में। एक दिन दोनों की मुलाकात हुई तो नमक वाले ने चीनी वाले को अपने गोदाम में रात्रिभोज के लिए निमंत्रित किया। रात हुई तो चीनी वाला बढ़िया से तैयार होकर, नमक के गोदाम में पहुँचा। नमक वाले ने उसके सामने नमक ईपरोसा। नमक जीभ पर रखते ही, थू थू थू थू करते हुए, चीनी वाले ने नमक थूक दिया। और कहा- हे भगवान! तूं इतनी कड़वी चीज खाता है? कल रात तूं मेरे गोदाम पर आना, मैं तुझे इस दुनिया की सब से स्वाद चीज चखाऊँगा। अगली रात नमक वाला चीनी के गोदाम में पहुँचा। चीनी वाले ने चीनी परोसी। नमक वाले ने चीनी का दाना मुँह में रखा, और उसने भी थू थू थू थू करते हुए, चीनी थूक दी। चीनी वाला बड़ा हैरान हुआ। पर वह सारी बात समझ गया कि जरूर यह अपने मुंह में नमक का दाना छिपाए है। इसीलिए इसे चीनी में स्वाद नहीं आया। वह बोला- मकोड़े भाई! मैं पानी लाता हूँ। तूं एकबार अच्छी तरह कुल्ला कर ले, फिर तुझे चीनी का असली स्वाद मालूम पड़ेगा। अपनी चाल पकड़ी जाने पर, नमक वाला मकोड़ा शर्मिंदा हो गया। उसने कुल्ला किया और फिर चीनी चखी। और तब उसकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा।  
ठीक ऐसे ही कबीर साहेब कहते है कि मैं भी दुनियावालों को भगवान की मीठी बात सुनाता हूँ। सत्य से परिचित करवाता हूं। पर वे अपने मन में संसार भर की कड़वी बातें दबाए रखते हैं। इसीलिए उन्हें मेरी बात मीठी नहीं लगती, कड़वी लगती है। अगर वे मेरी बात सुनने से पहले, श्रद्धा के जल से, अच्छी तरह कुल्ला कर लें, अपने मन को खाली कर लें, तब उन्हें मेरी बात की असली  मिठास का अनुभव हो जाए। मेरे बच्चे मुझे पहचान ले और यहां से मुक्ति पा लें।

Today spiritual..

जीव के लक्षण
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तब धर्मदास जी बोले - हे साहिब ! जब सभी योनियों के जीव एक समान हैं । तो फ़िर सभी जीवों को एक सा ग्यान क्यों नहीं है ?

कबीर साहिब बोले - हे धर्मदास ! सुनो । जीवों की इस असमानता की वजह तुम्हें समझाकर कहता हूँ । चार खानि के जीव एक समान हैं । परन्तु उनकी शरीर रचना में तत्व विशेष का अन्तर है । स्थावर खानि में सिर्फ़ एक ही तत्व होता है । ऊष्मज खानि में दो तत्व होते हैं । अण्डज खानि में तीन तत्व और पिण्डज खानि में चार तत्व होते हैं । इनसे अलग मनुष्य शरीर में 5 तत्व होते हैं ।

हे धर्मदास जी ! अब चार खानि का तत्व निर्णय भी जानों । अण्डज खानि में 3 तत्व - जल अग्नि और वायु हैं । स्थावर खानि में एक तत्व जल विशेष है । ऊष्मज खानि में दो तत्व वायु तथा अग्नि बराबर समझो । पिण्डज खानि में 4 तत्व अग्नि प्रथ्वी जल और वायु विशेष हैं । पिण्डज खानि में ही आने वाला मनुष्य - अग्नि वायु प्रथ्वी जल आकाश से बना है ।

तब धर्मदास जी बोले - हे बन्दीछोङ ! सदगुरु कबीर साहिब.. मनुष्य योनि में नर नारी तत्वों में एक समान हैं । परन्तु सबको एक समान ग्यान क्यों नहीं है । संतोष । क्षमा । दया । शील । आदि सदगुणों से कोई मनुष्य तो शून्य 0 होता है । तथा कोई इन गुणों से परिपूर्ण होता है । कोई मनुष्य पाप कर्म करने वाला अपराधी होता है । तो कोई विद्वान । कोई दूसरों को दुख देने वाले स्वभाव का होता है । तो कोई अति क्रोधी काल रूप होता है । कोई मनुष्य किसी जीव को मारकर उसका आहार करता है । तो कोई जीवों के प्रति दया भाव रखता है । कोई आध्यात्म की बात सुनकर सुख पाता है । तो कोई काल निरंजन के गुण गाता है । हे साहिब मनुष्यों में यह नाना गुण किस कारण से होते हैं ?

कबीर साहिब बोले - हे धर्मदास ! सुनो । मैं तुमसे मनुष्य योनि के नर नारी के गुण अवगुण को भली प्रकार से कहता हूँ । किस कारण से मनुष्य ग्यानी और अग्यानी भाव वाला होता है । वह पहचान सुनो ।

शेर । साँप । कुत्ता । गीदङ । सियार । कौवा । गिद्ध । सुअर । बिल्ली तथा इनके अलावा और भी अनेक जीव हैं । जो इनके समान हिंसक । पाप योनि । अभक्ष्य माँस आदि खाने वाले दुष्कर्मी । नीच गुणों वाले समझे जाते हैं । इन योनियों में से जो जीव आकर मनुष्य योनि में जन्म लेता है । तो भी उसके पीछे की योनि का स्वभाव नहीं छूटता । उसके पूर्व कर्मों का प्रभाव उसको अभी प्राप्त मानव योनि में भी बना रहता है । अतः वह मनुष्य देह पाकर भी पूर्व के से कर्मों में प्रवृत रहता है । ऐसे पशु योनियों से आये जीव नर देह में होते हुये भी प्रत्यक्ष पशु ही दिखायी देते हैं ।

जिस योनि से जो मनुष्य आया है । उसका स्वभाव भी वैसा ही होगा । जो दूसरों पर घात करने वाले क्रूर हिंसक पापकर्मी तथा क्रोधी विषैले स्वभाव के जीव हैं । उनका भी वैसा ही स्वभाव बना रहता है ।

हे धर्मदास जी ! मनुष्य योनि में जन्म लेकर ऐसे स्वभाव को मेटने का एक ही उपाय है कि किसी प्रकार सौभाग्य से सदगुरु मिल जायँ । तो वे ग्यान द्वारा अग्यान से उत्पन्न इस प्रभाव को नष्ट कर देते हैं । और फ़िर मनुष्य काग दशा ( विष्ठा मल आदि के समान वासनाओं की चाहत ) के प्रभाव को भूल जाता है । उसका अग्यान पूरी तरह समाप्त हो जाता है ।

तब हे भाई ! पूर्व पशु योनि और अभी की मनुष्य योनि का यह द्वंद छूट जाता है । श्री सदगुरुदेव ग्यान के आधार हैं । वे अपने शरण में आये हुये जीव को ग्यान अग्नि में तपाकर एवं उपाय से घिस पीटकर सत्यग्यान उपदेश अनुसार उसे वैसा ही बना लेते हैं । और निरंतर साधना अभ्यास से उस पर प्रभावी पूर्व योनियों के संस्कार समाप्त कर देते हैं ।

हे धर्मदास ! जिस प्रकार धोबी वस्त्र धोता है । और साबुन मलने से वस्त्र साफ़ हो जाता है । ..तब वस्त्र में यदि थोङा सा ही मैल हो । तो वह थोङी ही मेहनत से साफ़ हो जाता है । परन्तु वस्त्र बहुत अधिक गन्दा हो । तो उसको धोने में अधिक मेहनत की आवश्यकता होती है । हे धर्मदास ! वस्त्र की भांति ही जीवों के स्वभाव को जानों । कोई कोई जीव जो अंकुरी होता है । ऐसा जीव सदगुरु के थोङे से ग्यान को ही विचार कर शीघ्र गृहण कर लेता है । उसे ग्यान का संकेत ही बहुत होता है । अधिक ग्यान की आवश्यकता नहीं होती । ऐसा शिष्य ही सच्चे ग्यान का अधिकारी होता है ।

तब धर्मदास जी बोले - हे साहिब ! यह तो थोङी सी योनियों की बात हुयी । अब आप चार खानि के जीवों की बात कहें । चार खानि के जीव जब मनुष्य योनि में आते हैं । उनके लक्षण क्या हैं ? जिसे जानकर मैं सावधान हो जाऊँ ।

कबीर साहिब जी बोले - हे धर्मदास सुनो । 4 खानों की 84 लाख योनियों में भरमाया भटकता जीव जब बङे भाग्य से मनुष्य देह धारण करने का अवसर पाता है । तब उसके अच्छे बुरे लक्षणों का भेद तुमसे कहता हूँ ।

जिसको बहुत ही आलस नींद आती है । तथा कामी क्रोधी और दरिद्र होता है । वह अण्डज खानि से आया है। हुआ होता है । जो बहुत चंचल होता है । और चोरी करना जिसे अच्छा लगता है । धन माया की बहुत इच्छा रखता है । दूसरों की चुगली निंदा जिसे अच्छी लगती है । इसी स्वभाव के कारण वह दूसरों के घर वन तथा झाङी में आग लगाता है । तथा चंचल होने के कारण कभी बहुत रोता है । कभी नाचता कूदता है । कभी मंगल गाता है । भूत प्रेत की सेवा उसके मन को बहुत अच्छी लगती है । किसी को कुछ देता हुआ देखकर वह मन में चिङता है । किसी भी विषय पर सबसे वाद विवाद करता है । ग्यान ध्यान उसके मन में कुछ नहीं आते । वह गुरु सदगुरु को नहीं पहचानता न मानता । वेद शास्त्र को भी नहीं मानता । वह अपने मन से ही छोटा बङा बनता रहता है । और यह समझता है कि मेरे समान दूसरा कोई नहीं है । उसके वस्त्र मैले तथा आँखे कीचङ युक्त और मुँह से लार बहती है । वह अक्सर नहाता भी नहीं है । जुआ चौपङ के खेल में मन लगाता है । उसका पांव लम्बा होता है । और कभी कभी वह कुबङा भी होता है । हे धर्मदास ! ये सब अण्डज खानि से आये मनुष्य के लक्षण हैं ।

हे धर्मदास ! अब ऊष्मज के बारे में कहता हूँ । यह जंगल में जाकर शिकार करते हुये बहुत जीवों को मारकर खुश होता है । इन जीवों को मारकर अनेक तरह से पकाकर वह खाता है । वह सदगुरु के नाम ग्यान की निंदा करता है । गुरु की बुराई और निंदा करके वह गुरु के महत्व को मिटाने का प्रयास करता है । वह शब्द उपदेश और गुरु की निंदा करता है । वह बहुत बात करता है । तथा बहुत अकङता है । और अहंकार के कारण बहुत ग्यान बनाकर समझाता है । वह सभा में झूठे वचन कहता है । टेङी पगङी बाँधता है । जिसका किनारा छाती तक लटकता है । दया धर्म उसके मन में नहीं होता । जो कोई पुण्य धर्म करता है । वह उसकी हँसी उङाता है । माला पहनता है । और चंदन का तिलक लगाता है । तथा शुद्ध सफ़ेद वस्त्र पहनकर बाजार आदि में घूमता है । वह अन्दर से पापी और बाहर से दयावान दिखता है । ऐसा अधम नीच जीव यम के हाथ बिक जाता है । उसके दाँत लम्बे तथा बदन भयानक होता है । उसके पीले नेत्र होते हैं ।

कबीर साहिब जी बोले - हे धर्मदास ! अब स्थावर खानि से आये जीव ( मनुष्य ) के लक्षण सुनो । इससे आया जीव भैंसे के समान शरीर धारण करता है । ऐसे जीवों की बुद्धि क्षणिक होती है । अतः उनको पलटने में देर नहीं लगती । वह कमर में फ़ेंटा बाँधता है । तथा सिर पर पगङी बाँधता है । तथा राज दरबार की सेवा करता है । और कमर में तलवार कटार बाँधता है । इधर उधर देखता हुआ मन से सैन ( आँख मारकर इशारा करना ) मारता है । परायी स्त्री को सैन से बुलाता है । वह मुँह से रसभरी मीठी बातें कहता है । जिनमें कामवासना का प्रभाव होता है । वह दूसरे के घर को कुदृष्टि से ताकता है । तथा जाकर चोरी करता है । पकङे जाने पर राजा के पास लाया जाता है । जब सारा संसार भी उसकी हँसी उङाता है । फ़िर भी उसको लाज नहीं आती । एक क्षण में ही वह देवी देवता की पूजा करने की सोचता है । दूसरे ही क्षण विचार बदल देता है । कभी उसका मन किसी की सेवा में लग जाता है । फ़िर जल्दी ही वह उसको भूल भी जाता है । एक क्षण में ही वह किताब ( कोई ) पढकर ग्यानी बन जाता है । एक क्षण में ही वह सबके घर आना जाना घूमना करता है । एक क्षण में ही बहादुर और एक क्षण में ही कायर भी हो जाता है । एक क्षण में ही मन में साहू ( धनी ) हो जाता है । और दूसरे क्षण में ही चोरी करने की सोचता है । एक क्षण में धर्म और दूसरे क्षण में अधर्म भी करता है । इस प्रकार क्षण प्रतिक्षण मन के बदलते भावों के साथ वह सुखी दुखी होता है । वह भोजन करते समय माथा खुजाता है । तथा फ़िर बाँह जाँघ पर रगङता है । भोजन करता है । फ़िर सो जाता है । जो जगाता है । उसे मारने दौङता है । और गुस्से से जिसकी आँखे लाल हो जाती हैं । और उसका भेद कहाँ तक कहूँ ।

हे धर्मदास ! अब पिण्डज खानि से आये जीव का लक्षण सुनो । पिण्डज खानि से आया जीव वैरागी होता है । तथा योग साधना की मुद्राओं में उनमनी समाधि का मत आदि धारण करने वाला होता है । और वह जीव वेद आदि का विचार कर धर्म कर्म करता है । वह तीर्थ वृत ध्यान योग समाधि में लगन वाला होता है । उसका मन गुरु के चरणों में भली प्रकार लगता है । वह वेद पुराण का ग्यानी होकर बहुत ग्यान करता है । और सभा में बैठकर मधुर वार्तालाप करता है । राज मिलने का तथा राज के कार्य करने का और स्त्री सुख को बहुत मानता है । कभी भी अपने मन में शंका नहीं लाता । और धन संपत्ति के सुख को मानता है । बिस्तर पर सुन्दर शैया बिछाता है । उसे उत्तम शुद्ध सात्विक पौष्टिक भोजन बहुत अच्छा लगता है। वह पुण्य कर्म में धन खर्च करता है । उसकी आँखों में तेज और शरीर में पुरुषार्थ होता है । स्वर्ग सदा उसके वश में है । वह कहीं भी देवी देवता को देखता है । तो माथा झुकाता है उसका ध्यान सुमरन में बहुत मन लगता है । तथा वह सदा गुरु के अधीन रहता है ।

अधिक जानकारी के लिए पढ़िए संत रामपाल जी महाराज द्वारा लिखित सर्व धर्म ग्रंथों व शास्त्रों, पुराणों तथा वेदों से प्रमाणित पुस्तक👉 जीने की राह👉 ज्ञान गंगा 👉कबीर परमेश्वर 👉 यथार्थ कबीर पंथ का परिचय।।

हमारे वेबसाइट-:
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Say no to Alcohol

💦नशा करने से नाश होता है। इसलिए पूर्ण संत के सत्संग सुनें जिससे ग्रह क्लेश भी समाप्त हो जाता है।

💦परमात्मा कबीर साहेब जी अपनी अमर वाणी में कहते हैं
मदिरा(शराब) पीवे कड़वा पानी,
सत्तर जन्म कुत्ते के जानी।।
शराब पीने से 70 जन्म तक कुत्ता बनने की सजा मिलेगी। ये खुद परमात्मा ने बताया है। आज ही त्यागें ऐसी बुरी वस्तु को।

💦संत गरीबदास जी अपनी वाणी में कहते है-
सुरापान मद्य मांसाहारी, गवन करे भोगे पर नारी।
सत्तर जन्म कटत हैं शीशम, साक्षी साहिब हैं जगदीशम।।
सुरापान व मांस आदि खाने का अंजाम जब इतना बुरा है तो इससे त्यागने में ही भलाई है।


💦नशा चाहे शराब, सुल्फा, अफीम, हिरोईन आदि-आदि किसी का भी करते हो, यह आपका सर्वनाश का कारण बनेगा।
इस का किसी भी शास्त्र में उल्लेख नहीं कि नशा करें।
यह मानव समाज को बर्बाद कर रहा है।

💦शराब मानव जीवन बर्बाद करती है। इस बारे में परमात्मा कबीर साहेब जी कहते हैं-
भांग तम्बाकू छोतरा, आफू और शराब
गरीबदास कौन करे बंदगी, ये तो करें खराब।
शराब भक्ति का नाश करती है। इसे त्यागने में ही भलाई है।

💦 शराब गृह क्लेश को जन्म देती है व आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक बदहाली अपने साथ लेकर आती है।
इससे दूरी रखना ही समझदारी है।

💦 यदि आप शराब की लत नहीं छोड़ पा रहे हैं और नशा मुक्ति केंद्र से भी आपको इस बारे में सफलता नहीं मिली है।
तो निराश न हों संत रामपाल जी महाराज से उपदेश लेकर आप इसे बड़ी आसानी से छोड़ सकते हैं।

💦 नशा सर्वप्रथम तो इंसान को शैतान बनाता है फिर शरीर का नाश हृदय है। शरीर के चार महत्वपूर्ण अंग हैं फेफड़े, लीवर, गुर्दे, हृदय। शराब सबसे प्रथम इन चारों अंगों को खराब करती है। इन सब से निजात पाने के लिए संत रामपाल जी महाराज के सत्संग अवश्य सुनें।

💦शराब में ऐसा नशा है जो अनमोल मानव जीवन को बर्बाद कर देती है। सद्भगति में ऐसा नशा है जो मर्यादा में रहकर की जाए तो जीवन को आबाद कर देती है। फैसला आपको करना है।

💦शराब व अन्य विकारों में मानव जीवन को उलझाकर मानव को सद्भगति से दूर रखना काल की सुनियोजित चाल है।
भोली जनता काल कसाई की चाल में फंस रही है।

💦शराबी व्यक्ति का शरीर रोगों की खान बन जाता है। जिस कारण उनके परिवार को उनके नशे और बीमारियों पर खर्च के कारण दोहरी मार पड़ती है।

💦शराब एक ऐसी खतरनाक बुराई है जो बसे बसाए खुशहाल परिवार को भी उजाड़ देती है, तथा धन व बल दोनों का नाश करती है।

💦शराबी व्यक्ति विचार करें
आज किसी की भी संतान उस समय बहुत गर्व महसूस करती है जब उसे अपने स्वावलंबी पिता का परिचय देना हो।
शराबी परिजन का परिचय देने में बच्चे हीन भावना का शिकार होते हैं।

💦भगवान के संविधान अनुसार एक बार शराब पीने वाले के 70 जन्म कुत्ते के होते हैं।

💦देवता भी मनुष्य जीवन को तरसते हैं क्योंकि मोक्ष मनुष्य जीवन में ही हो सकता है।
और परमात्मा का विधान है कोई भी नशा करने वाला मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता और आप इस अनमोल जीवन को शराब पीने में बर्बाद कर रहे हो।

💦शराब के पीने से कैंसर जैसी भयानक बीमारियाँ होती हैं। इससे मनुष्य हरदम दुःखी होता है। नए नए रोग होते हैं नशे की वजह से।

💦नशा हमारे भगति मार्ग में सबसे बड़ा  बाधक है।
  - संत रामपाल जी महाराज

💦 सतभक्ति से शराब छूट सकती है।
आज संत रामपाल जी से उपदेश लेकर बहुत लोग शराब छोड़ चुके हैं और उनके परिवार में खुशहाली आई है।

💦किसी भी धर्म के पवित्र धर्मग्रंथों में शराब पीने का वर्णन नहीं है। फिर हम धर्म के विरुद्ध आचरण क्यों कर रहे हैं ?

Tuesday, May 5, 2020

Vedas

#LordKabir_In_Vedas
🔥Rig Ved Mandal 9, Sukt 94, Mantra 1

God wanders on this earth and spreads his knowledge like a poet through his poems, couplets etc...
 

Today spiritual knowledge

#Who_Is_Kaal
 Adhyaya 11 verses 21 and 46, Arjuna is saying that God!  You are also eating sages, gods and siddhas, who are praising you.  O Sahastrabahu means God with a thousand arms!  You come in the same quadrant 
read by gyan ganga book. 

धनतेरस के फायदे

क्या है धनतेरस संपादित करें कार्तिक  माह (पूर्णिमान्त) की  कृष्ण पक्ष  की  त्रयोदशी  तिथि के दिन  समुद्र-मंन्थन  के समय  भगवान धन्वन्तरि  अम...