Wednesday, June 24, 2020

आत्महत्या सही है या गलत।

आत्महत्या

क्या है आत्म हत्या
 आत्महत्या का सीधा मतलब जानबूझकर खुद को मारना या स्वयं की हत्या अपने ही द्वारा करना है  आत्महत्या है यदि गहनता में जाए तो इसके पीछे आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के कई कारण या परेशानियां मजबूरियां रहती है जिससे वह ऐसा कदम उठाता है समान्यतः कोई भी व्यक्ति खुद को नुकसान नही पहुचाता पर कुछ कारण ऐसे रहते है।।


आत्म हत्या के कारण

आत्महत्या के वैसे तो कई तरह के कारण रहते है फिर भी हम जितना समझते है उस हिसाब से या हमारे आस पास में हुई आत्महत्या का कारण हमें पता होता है। आत्महत्या का संपन्नता और विपन्नता से कोई सरोकार नहीं है यक्ति को कुछ मानसिक प्रॉब्लम है या अंदर ही अंदर कोई बात खाए जा रही हो उस स्थिति में भी यह कदम उठता कुछ ऐसी घटना ऐसी बाते जो उसके जीवन को झकझोर देती है किसी करीबी दिया धोखा या उसके द्वारा की बदनामी भी यह कदम उठाने
आत्माहत्या के कई कारण है जैसे 8
तनाव मानसिक रूप से ग्रस्त
डिप्रेशन जीवन मे हुई बुरी बातों से उसे लगता है कि जिंदगी नही जीना चाइए।
डिस्ट्रेट बच्चो को करियर बनाने के लिए तनाव डालना।



आत्महत्या सही है या ग़लत

पहली बात तो यह है कि आत्महत्या शब्द ही गलत है शरीर नष्ट होता है आत्मा नही सनातन धर्म के अनुसार रही बात शरीर के तो दूसरे जीवो को मारने पर भी दोष लगता है सजा का प्रावधान है तो स्वयं के जीवन को नष्ट करना भी बहुत बड़ा अपराध है। यह अनमोल मनुष्य जीवन बारबार प्राप्त नही होता जो भी कर्म बनने हे अच्छे बुरे वह इसी मनुष्य शरीर से बनते है फिर हम इस अनमोल जीवन को नष्ट क्यो करे वैसे इसी जीवन को ईश्वर की सत्य साधना में लगाए तो भक्ति लाभ तो मिलेगा ही साथ मे हम आत्मा शरीर दोनो से प्रबल हो जाएंगे जिससे मनुष्य आत्म हत्या के बारे में सोच भी नही सकता आत्मा हत्या के जितने भी कारण रहे है वह सांसारिकता से जुड़े हम सांसारिकता को महत्व देने के बजाए ईश्वर को महत्व दे।।



आध्यात्मिक जानकारी के लिए रोज देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 जिसमे इस मनुष्य देह का वास्तविक उद्देश्य बताया जाएगा।।





Wednesday, June 17, 2020

जन्माष्टमी


जन्माष्टमी श्री कृष्ण का जन्मोउत्सव है, मतलब उनका जन्म आज हम जानेगे, की वास्तव में नाशवान प्रभु को है और अविनाशी कौन है।




कोन है अविनाशी परमेश्वर
यदि हम बात करे भगवान श्रीकृष्ण की तो वे विष्णु के अवतार माने जाते है, त्रिलोकी नाथ प्रभु है।
और यह जन्म-मरण के अंतगर्त आते है। श्री कृष्ण की जीवनी में स्वयं वे माँ के गर्भ से जन्म लेते है। और अंत मे इनकी मृत्यु भी एक भील के विषाक्त तीर से प्रारब्ध के अनुसार होती है।
श्री देवी महापुराण में एक प्रकरण है अद्याय 5 स्कंद 3 पृष्ठ 123 पर महाभाग विष्णु , देवी दुर्गा की स्तुति करते हुए कह रहे है, है जगत जननी प्रकृति सनातनी देवी यह सारा संसार तुम्ही से उद्भाषित है में, बर्ह्म विष्णु शंकर हमारा तो आविर्भाव(जन्म) और तिरोभाव(मृत्यु) हुआ करती है मतलब साफ है कि यह नाशवान प्रभु है।
वास्तव में अविनाशी परमेश्वर
वास्तव में अविनाशी परमात्मा कबीर परमेश्वर है वेदों में उन्हें कविर्देव कहा है। जो सबका धारण पोषण करता है ।
और उनके महापुरूषों की वाणी प्रमाणित करती है कि साहेब कबीर ही अविनाशी परमात्मा है।
 मलूक दास जी की वाणी
           चार दाग से सतगुरु न्यारा अजरो अजर शरीर ।
          कोई गाढ़े कोई अग्नि जरावे ढूंढा ना पाया शरीर।
         
   

श्री कृष्ण और परमेश्वर कबीर की लीलाए
श्री कृष्ण की लीला में एक प्रकरण है, जब उनके घनिष्ट मित्र सुदामा जी उनसे मिलने गए तब वह अपने परम मित्र के लिए एक मुट्ठी चावल लेकर गए श्री कृष्ण ने प्रेमपूर्वक उन्हें खाकर सुदामा के लिए उसके बदले एक सुंदर महक बनवा दीया।

वही परमेश्वर कबीर जी ने तैमूर लंग को एक रोटी के बदले सात पीढ़ी तक का राज्य दे दिया वास्तव में अविनाशी परमेश्वर के लिए सर्व सम्भव है।



 पांडवो का यज्ञ

श्री कृष्ण जी के मौजूद रहते हुए भी पांडवो का अश्वमेव का यज्ञ पूर्ण न हुआ शंख न बजा ऐसे में द्वापर युग मे आए करुणामय नाम से कबीर परमेश्वर ने अपने शिष्य सुपच शुदर्शन के रुप में आकर यज्ञ में भोजन प्राप्त किया उसके उपरांत वह शंख इतना जोर से बजा की तीन लोक तक उसकी आवाज गई और वह यज्ञ पूर्ण हुआ।। 



वास्तव में श्रीकृष्ण उर्फ विष्णु जी से ऊपर भी कोई भगवान है जो सर्वोच्च है उसकी शक्ति के सामने सर्व शक्ति फीकी है वह गीता के अनुसार उतम पुरुष है अद्याय 15 के श्लोक 17 व उसे सच्चिदानंद धन ब्रह्म भी कहा है और अद्याय 18 के श्लोक 62 में उसकी साधना से उसकी की कृपा से वह शास्वत परमधाम प्राप्त हो सकता है।। 

अधिक जानकारी के लिए देखे साधना tv रोज शाम 7:30 से 8:30 बजे तक। 

Tuesday, June 9, 2020

Bible knowledge

Bible

पवित्र बाइबल के अनुसार परमात्मा का स्वरूप


परमेश्वर ने 6 दिन में सृष्टि का सृजन किया । इसमें उन्होने  अपने स्वरुप की भी जानकारी दी है । की परमेश्वर कैसे है 
6 दिन मनुष्य और प्राणी तब पिता परमेश्वर ने कहा कि हम मनुष्य को अपने स्वरूप और अपनी समानता अनुसार बनाएगे जो जमीन पर रेंगने वाले जन्तुओ पक्षियों आदि पर अधिकार रखे मारे नही।
फिर परमेश्वर ने मानव को अपने स्वरूप अनुसार रचा। और नर और नारी करके उत्पन्न किया सृष्टि की।


पवित्र बाइबल के अनुसार मनुष्य के आहार।
पिता परमेश्वर ने मनुष्य के खाने के लिए बीजदर पौधे जितने भी है छोटे बड़े सब दिए वनस्पति फल इत्यादि।
जन्तुओ पर अधिकार रखने को कहा उनको मारने के लिए आदेश नही दिया।


आदम और हव्वा

आदम और हव्वा स्त्री और पुरुष थे । जिनको प्रारम्भ में अच्छे बुरे का ज्ञान नही था। परमेश्वर यहोवा में उन्हें अपने बाग में रखा था, तथा कहा कि इस बाग के सारे फल तुम खा सकते है, इन बीच वाले वृक्ष का फल मत खाना  क्योकि उनको डर था कि, उन वृक्ष का फल खाकर ये हम में से एक नही हो जाए।  नित्य की तरह वे बाग के दूसरे फल खाते थे, लेकिन एक सर्प ने जब हव्वा को उकसाया की वह फल खाने से अच्छे और बुरे का ज्ञान होता है, तब हव्वा ने वह फल थोड़ा स्वयं खाया और आदम को खिलाया,, जिससे उन्हें भले बुरे का ज्ञान हुआ उन्हें एक दूसरे से लज्जा आने लगी क्योकि वह नंगे थे। तब यहोवा परमेश्वर आता है और उनको आवाज लगाता है,, तब वह छुप जाते है  और कहते है हम नंगे है,, यहोवा परमेश्वर का पता चल जाता है कि उन्होंने भले-बुरे का ज्ञान कराने वाला फल खा लिया,, तब वह दोनों के लिए केले की छाल वाले वस्त्र बनाते है।

तब उस काल प्रभु ने आदम और हव्वा को जीवन के वृक्ष वाला फल खाने की सजा दी। और कहा कि अब तुम्हे पेट भरने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ेगा। और औरत हव्वा को श्राप दिया कि तू हमेशा आदमी के पराधीन रहेगी।।

अधिक जानकारी के लिए देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 तक।

Friday, June 5, 2020

शुभ अशुभ।

कुरीति

हमारे समाज में ये परम्परा सी बनी हुई हैं कि जब भी कोई  काम शुरु करते हैं शुभ मुहूर्त निकलवाते है ब्रह्माणों से...

 जैसे किसी की बेटी की शादी होगी तो पहले शुभ मुहूर्त निकलवायेगे शुभ लग्न में शादी करेंगे
अगर हम उदाहरण ले राजा जनक का तो उन्होंने भी सीता जी का ब्याह राजा दशरथ के पुत्र श्री राम जी से किया जो संस्कार था !
ब्रह्माण के पास, पंडित जी के पास गये, शादी किस लग्न में, किस नक्षत्र में ठीक रहेगा... तो ये ब्रह्माण लोग ये बताते है ये ज्योतिष.. कि फलानी तारिक को शुभ मुहूर्त है फलानी को शुभ नहीं है शादी नहीं करनी चाहिए
 सब इन ब्रह्माणों से शुभ लग्न निकलवाकर शादी करते हैं फिर भी बेटी विधवा क्यों हो जाती है?? फिर भी कोई सुख नहीं..

  परमात्मा कहते हैं कि कर्म रेख टारी नहीं टरै आप जो साधना करते हो उससे आपके जो लेख है वो नहीं टल सकते...
वो टलेगे पूर्ण परमात्मा की भक्ति से, कबीर परमात्मा की साधना से...हमारे माड़े लेख भी टलेगे

  सीता जी के ब्याह के बारे में बताते हैं कि वशीष्ट मुनी जी राजा दशरथ के गुरु थे।
और श्री राम जी लक्ष्मण जी के गुरु थे...
तो वशीष्ट मुनी जी ने 3 दिन तक ब्याह रोक दिया सीता जी का..
जब की राम जी ने धनुष भी तोड़ दिया.. उनका मानना था कि अभी शुभ घड़ी नहीं है, तीसरे चौथे दिन जाकर शुभ लग्न शुभ नक्षत्र हो जाये और फिर सीता जी सदा सुखी रहेगी...
  फिर शादी हुआ, शादी होते ही बनवास हुआ, बनवास में अपहरण हुआ वहां युद्ध  हुआ पता नहीं कितना आदमी मर गये, फिर सीता जी को लाये और फिर आते ही घर से निकाल दिया... अब बताओ कौनसा सुख हुआ..

  वशीष्ट मुनी जी जैसे ब्रह्माण आज तो हो ही नहीं सकते...कबीर परमात्मा कहते हैं कि...
"वशीष्ट मुनी से तत् वित त्रिकाली योगी"
जिसको आप तीनों कालों को जानने वाले मानते हो,मानते थे
वशीष्ट मुनी से तत् विता (तिरकाली) योगी और सूज के लग्न धरै!
और सीता हरण, मरण दशरथ का
वो वन में राम फिरै!!

कैसा राज दिया लग्न के सौधन ने, पिता मर गये, बनवास हो गया, कहाँ राम जी कहाँ सीता जी??
क्या सहारा दिया उस लग्न ने??

इस लिए कहते हैं कि परमात्मा का नाम लेकर भक्ति करें हर दिन ही शुभ मुहूर्त है

पूर्ण परमात्मा के नाम से  हमारे दसों दिशाओं का दिशा सूल समाप्त हो जायेगा

समरथ की शरणा गहै रंग होरी हो!
कदै ना हो अकाज राम रंग होरी हो!!


साधना टीवी पर देखें सत्संग हर शाम 7:30 बजे 
 5 जून को सुबह 9-12 बजे तक साधना चैनल पर कबीर 623 वाँ प्रकट दिवस के अवसर पर जरुर देखें !

Tuesday, June 2, 2020

 बोध कथा
पूजा तथा साधना में अंतर

           
 प्रश्न:- काल ब्रह्म की पूजा करनी चाहिए या नहीं? गीता में प्रमाण दिखाऐं। उत्तरः- नहीं करनी चाहिए। पहले आप जी को पूजा तथा साधना का भेद बताते हैं।

भक्ति अर्थात् पूजा:- जैसे हमारे को पता है कि पृथ्वी के अन्दर मीठा शीतल जल है। उसको प्राप्त कैसे किया जा सकता है? उसके लिए बोकी के द्वारा जमीन में सुराख किया जाता है, उस सुराख (ठवतम) में लोहे की पाईप डाली जाती है, फिर हैण्डपम्प (नल) की मशीन लगाई जाती है, तब वह शीतल जीवनदाता जल प्राप्त होता है।

हमारा पूज्य जल है, उसको प्राप्त करने के लिए प्रयोग किए उपकरण तथा प्रयत्न साधना जानें। यदि हम उपकरणों की पूजा में लगे रहे तो जल प्राप्त नहीं कर सकते, उपकरणों द्वारा पूज्य वस्तु प्राप्त होती है।

अन्य उदाहरण:-
जैसे हमारी इच्छा आम खाने की होती है, हमारे लिए आम का फल पूज्य है। उसे प्राप्त करने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। धन संग्रह करने के लिए मजदूरी/नौकरी/खेती-बाड़ी करनी पड़ती है, तब आम का फल प्राप्त होता है। इसलिए आम पूज्य है तथा अन्य क्रिया साधना है। साध्य वस्तु को प्राप्त करने के लिए साधना करनी पड़ती है, साधना भिन्न है, पूजा अर्थात् भक्ति भिन्न है। स्पष्ट हुआ।

प्रश्न चल रहा है कि क्या ब्रह्म की पूजा करनी चाहिए। उत्तर में कहा है कि नहीं करनी चाहिए। अब श्रीमद् भगवत गीता में प्रमाण दिखाते हैं।

गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में तो गीता ज्ञान दाता ने बता दिया कि तीनों गुणों (रजगुण श्री ब्रह्मा जी, सतगुण श्री विष्णु जी तथा तमगुण श्री शिव जी) की भक्ति व्यर्थ है। फिर गीता अध्याय 7 के श्लोक 16-17-18 में गीता ज्ञान दाता ब्रह्म ने अपनी भक्ति से होने वाली गति अर्थात् मोक्ष को “अनुत्तम” अर्थात् घटिया बताया है। बताया है कि मेरी भक्ति चार प्रकार के व्यक्ति करते हैं।

1. अर्थार्थी:-धन लाभ के लिए वेदों अनुसार अनुष्ठान करने वाले।

2. आर्त:-संकट निवारण के लिए वेदों अनुसार अनुष्ठान करने वाले।

3. जिज्ञासु:-परमात्मा के विषय में जानने के इच्छुक।
(ज्ञान ग्रहण करके स्वयं वक्ता बन जाने वाले)
इन तीनों प्रकार के ब्रह्म पुजारियों को व्यर्थ बताया है।

4. ज्ञानी:- ज्ञानी को पता चलता है कि मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है। मनुष्य जीवन प्राप्त करके आत्म-कल्याण कराना चाहिए। उन्हें यह भी ज्ञान हो जाता है कि अन्य देवताओं की पूजा से मोक्ष लाभ होने वाला नहीं है। इसलिए एक परमात्मा की भक्ति अनन्य मन से करने से पूर्ण मोक्ष संभव है। उनको तत्वदर्शी सन्त न मिलने से उन्होंने जैसा भी वेदों को जाना, उसी आधार से ब्रह्म को एक समर्थ प्रभु मानकर यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्रा 15 से ओम् नाम लेकर भक्ति की, परन्तु पूर्ण मोक्ष नहीं हुआ। ओम् (ऊँ) नाम ब्रह्म साधना का है, उससे ब्रह्मलोक प्राप्त होता है जोकि पूर्व में प्रमाणित किया जा चुका है। गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में कहा है कि ब्रह्म लोक प्रयन्त सब लोक पुनरावर्ती में हैं अर्थात् ब्रह्म लोक में गए साधक भी पुनः लौटकर संसार में जन्म-मृत्यु के चक्र में गिरते हैं।

काल ब्रह्म की साधना से वह मोक्ष प्राप्त नहीं होता जो गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में बताया है कि “तत्वज्ञान से अज्ञान को काटकर परमेश्वर के उस परम पद की खोज करनी चाहिए जहाँ जाने के पश्चात् साधक फिर लौटकर संसार में कभी वापिस नहीं आते।‘‘

गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि ये ज्ञानी आत्मा (जो चैथे नम्बर के ब्रह्म के साधक कहें हैं) हैं तो उदार अर्थात् नेक, परंतु ये तत्वज्ञान के अभाव से मेरी अनुत्तम् गति में ही स्थित रहे। गीता ज्ञान दाता ने अपनी साधना से होने वाली गति को भी अनुत्तम अर्थात् घटिया कहा है, इसलिए ब्रह्म पूजा करना भी उचित नहीं।

Monday, June 1, 2020



ऋषि कपिल और सागर राजा के 60 हजार पुत्र
     
   
 एक कपिल नाम के ऋषि थे जिनको भगवान विष्णु के 24 अवतारों में से एक अवतार भी माना जाता है, वे तपस्या कर रहे थे।

एक सागर राजा था। उसके 60 हजार पुत्र थे। किसी ऋषि ने बताया कि यदि एक तालाब, एक कुआँ, एक बगीचा बना दिया जाए तो एक अश्वमेघ यज्ञ जितना फल मिलता है। राजा सगड़ के लड़कों ने यह कार्य शुरू कर दिया। समझदार व्यक्तियों ने उनसे कहा कि आप ऐसे जगह-जगह तालाब, कुएँ, बगीचे बनाओगे तो पृथ्वी पर अन्न उत्पन्न करने के लिए स्थान ही नहीं रहेगा। किसी राजा ने विरोध किया तो उससे लड़ाई कर ली। उन राजा सगड़ के लड़कों ने एक घोड़ा अपने साथ लिया। उसके गले में पत्रा लिखकर बाँध दिया कि यदि कोई हमारे कार्य में बाधा करेगा, वह इस घोड़े को पकड़ ले और युद्ध के लिए तैयार हो जाए। उन सिरफिरों से कौन टक्कर ले? पृथ्वी देवी भगवान विष्णु जी के पास गई। एक गाय का रूप धारण करके कहा कि हे भगवान! पृथ्वी पर एक सगड़ राजा है। उसके 60 हजार पुत्रा हैं। उनको ऐसी सिरड़ उठी है कि मेरे को खोद डाला। वहाँ मनुष्यों के खाने के लिए अन्न भी उत्पन्न नहीं हो सकता। भगवान विष्णु ने कहा तुम जाओ, वे अब कुछ नहीं करेंगे। भगवान विष्णु ने देवराज इन्द्र को बुलाया और समझाया कि राजा सघड़ के 60 हजार लड़के यज्ञ कर रहे हैं। यदि उनकी 100 यज्ञ पूरी हो गई तो तुम्हारी इन्द्र गद्दी उनको देनी पडे़गी, समय रहते कुछ बनता है तो कर ले। इन्द्र ने हलकारे अर्थात् अपने नौकर भेजे, उनको सब समझा दिया। रात्रि के समय राजा सघड़ के पुत्रा सोए पड़े थे। घोड़ा वृक्ष से बाँध रखा था। उन देवराज के फरिश्तों ने घोड़ा खोलकर कपिल तपस्वी की जाँघ पर बाँध दिया। कपिल ऋषि वर्षों से तपस्यारत था। जिस कारण से उसका शरीर अस्थिपिंजर जैसा हो गया था। आसन पदम लगाए हुए था, टाँगें पतली-पतली थी। जैसे वृक्ष की जड़ों की मिट्टी वर्षा के पानी से बह जाती हैं और जड़ों के बीच में 6.7 इंच का अन्तर (gap) हो जाता है, ऋषि कपिल जी की टाँगें ऐसी थीं। इन्द्र के हलकारों ने घोड़े को टाँगों के बीच के रास्ते में से जाँघ के पास रस्से से बाँध दिया।

राजा के लड़कों ने सुबह उठते ही घोड़ा देखा। उसकी खोज में युद्ध करने की तैयारी करके 60 हजार का लंगार चल पड़ा। घोड़े के पद्चिन्हों के साथ-साथ कपिल मुनि के आश्रम में पहुँच गए। घोड़े को बँधा देखकर सगड़ राजा के पुत्रों ने ऋषि की ही कोख में  भाले चुभो दिए। कपिल ऋषि की पलकें इतनी लम्बी बढ़ चुकी थी कि जमीन पर जा टिकी थी। ऋषि को पीड़ा हुई तो क्रोधवश पलकों को हाथों से उठाया, आँखों से अग्नि बाण छूटे। 60 हजार सगड़ के पुत्रों की सेना की पूली-सी बिछ गई अर्थात् 60 हजार सगड़ के बेटे मरकर ढे़र हो गए।

सूक्ष्मवेद में कहा है कि:-

60 हजार सगड़ के होते, कपिल मुनिश्वर खाए।
जै परमेश्वर की करें भक्ति, तो अजर-अमर हो जाए।।
72 क्षौणी खा गया, चुणक ऋषिश्वर एक।
देह धारें जौरा फिरैं, सभी काल के भेष।।
दुर्वासा कोपे तहाँ, समझ न आई नीच।
56 करोड़ यादव कटे, मची रूधिर की कीच।।

भावार्थ:- कपिल मुनि जी, चुणक मुनि जी तथा दुर्वासा मुनि जी संसार में कितने प्रसिद्ध हैं, ये सब काल ब्रह्म की भक्ति करने वाले भेषधारी ऋषि हैं। ये चलती-फिरती मौत थी। चलती-फिरती मनुष्य रूप में घाल हैं। (घाल = एक मिट्टी के छोटे मटके को तांत्रिक विद्या से आकाश में उड़ाकर दुश्मन पर छोड़ता है। उससे बहुत हानि होती है।) गलती से भोले प्राणी इनको महान आत्मा मानते हैं। ये सब ज्ञानी आत्मा थे, ये सब उदार हृदय के थे। इन्होंने परमात्मा प्राप्ति के लिए अपना कल्याण कराने के लिए तन-मन-धन अर्पित कर दिया, परंतु तत्वदर्शी सन्त न मिलने के कारण इन्होंने काल ब्रह्म को एक समर्थ प्रभु मानकर गलती की और उसी की साधना ओम् (ॐ) नाम के जाप के साथ तथा अधिक हठ योग समाधि के द्वारा की, जिससे परमात्मा प्राप्ति तो है ही नहीं, उल्टा हानि होती है क्योंकि यह साधना शास्त्रा विरूद्ध है।

गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में कहा है कि शास्त्राविधि को त्यागकर जो मनमाना आचरण करते हैं, उनकी साधना व्यर्थ है। वे उदार आत्माऐं इसी कारण काल ब्रह्म की अनुत्तम गति में स्थित रहें।

गीता अध्याय 17 श्लोक 5, 6 में कहा है कि:- जो मनुष्य शास्त्रा विधि रहित केवल मन कल्पित घोर तप को तपते हैं और दम्भ अहंकार से युक्त, कामना आसक्ति अभिमान से युक्त हैं।

शरीर में स्थित सर्व कमलों में देव शक्तियों तथा पूर्ण परमात्मा तथा मुझे भी कृश करने वाले अर्थात् कष्ट देने वाले अज्ञानियों को तू असुर स्वभाव के जान। (गीता अध्याय 17 श्लोक 6)

यही प्रमाण गीता अध्याय 16 श्लोक 17 से 20 में है।

 वे अपने आपको श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरूष धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्रा यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्राविधि रहित पूजन करते हैं। (गीता अध्याय 16 श्लोक 17)

अहंकार, बल, घमण्ड, कामना, क्रोध आदि के वश और दूसरों की निन्दा करने वाले पुरूष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझसे द्वेष करने वाले होते हैं। (गीता अध्याय 16 श्लोक 18)

उन द्वेष करने वाले पापाचीर क्रूरकर्मी “जो वचन से करोड़ो व्यक्तियों की हत्या करने वाले” नराधमों अर्थात् नीच मनुष्यों को मैं संसार में बार-बार आसुरी अर्थात् राक्षसी योनियों में ही डालता हूँ। (गीता अध्याय 16 श्लोक 19)

हे अर्जुन! वे मूर्ख मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनियों को प्राप्त होते हैं, उससे भी अति नीच गति को प्राप्त होते हैं अर्थात् घोर नरक में गिरते हैं। (गीता अध्याय 17 श्लोक 20)

उपरोक्त प्रमाणों से सिद्ध हुआ कि गीता अध्याय 7 श्लोक 18 में गीता ज्ञान दाता ने अपनी साधना से होने वाली गति को भी इसलिए अनुत्तम अर्थात् घटिया बताया है। कहा है कि:-

गीता अध्याय 7 श्लोक 18 गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि जो चैथी प्रकार के ज्ञानी साधक हैं, वे सभी हैं तो उदार क्योंकि परमात्मा प्राप्ति के लिए अपने शरीर के नष्ट होने की भी प्रवाह नहीं की और हजारों वर्ष भूखे-प्यासे साधनारत रहे, परंतु तत्वदर्शी सन्त न मिलने के कारण वे सभी मेरी अनुत्तम अर्थात् घटिया गति अर्थात् ब्रह्म साधना से होने वाले मोक्ष जो ऊपर ऋषियों को हुआ, उसमें स्थित रहे अर्थात् जन्म-मरण, चैरासी लाख योनियों के चक्कर वाली गति में रह गए

धनतेरस के फायदे

क्या है धनतेरस संपादित करें कार्तिक  माह (पूर्णिमान्त) की  कृष्ण पक्ष  की  त्रयोदशी  तिथि के दिन  समुद्र-मंन्थन  के समय  भगवान धन्वन्तरि  अम...