Wednesday, July 15, 2020

संत रामपाल जी महाराज की संघर्ष यात्रा।

संत रामपाल जी महाराज
     संत रामपाल जी महाराज का जन्म 8 सितंबर 1951 को हरियाणा प्रान्त के  सोनीपत जिले में गाँव धनाना में हुआ।
अपनी पढ़ाई पूर्ण करने के उपरांत हरियाणा प्रान्त में जूनियर इंजीनियर की पोस्ट पर 18 वर्ष कार्यरत रहे।
 उन्होंने 1988 में परम् संत रामदेवानंद जी महाराज से दीक्षा प्राप्त की और सत्यभक्ति में पूर्णता सक्रिय हो गए तथा परमात्मा का साक्षात्कार किया।
संत रामपाल जी महाराज को 37 वर्ष की आयु में नाम दीक्षा प्राप्त हुई थी। और यही उनका आध्यात्मिक जन्म था।



संत रामपाल जी महाराज द्वारा नाम उपदेश
सन् 1993 में स्वामी रामदेवानंद जी महाराज ने आपको सत्संग करने की आज्ञा दी तथा सन् 1994 में नामदान करने की आज्ञा प्रदान की। भक्ति मार्ग में लीन होने के कारण जे.ई. की पोस्ट से त्यागपत्र दे दिया जो हरियाणा सरकार द्वारा 16.5.2000 को पत्र क्रमांक 3492-3500, तिथि 16.5.2000 के तहत स्वीकृत है। सन् 1994 से 1998 तक संत रामपाल जी महाराज ने घर-घर, गांव-गांव, नगर-नगर में जाकर सत्संग किया। बहु संख्या में अनुयाई हो गये। साथ-साथ ज्ञानहीन संतों का विरोध भी बढ़ता गया


संत रामपाल जी महाराज का संघर्ष
जब 1994 में संत जी को एक सत्संग के दौरान स्वामी रामदेवानंद जी महाराज ने आगे बुलाया और अचानक कहा कि रामपाल आज से नाम दीक्षा आप दोंगे तब संत जी कुछ समझ न पाए और सोचने लगे कि इतना महत्वपूर्ण कार्य मेरे ऊपर लेकिन स्वामी रामदेवानंद जी महाराज को तो पता था,, यही वह महापुरुष बनेगा जो आगे इस सत्यज्ञान को ले जाएगा। अपने पूज्य गुरुदेव रामदेवानंद जी महाराज के सतलोक जाने के उपरांत रामपाल जी महाराज का संघर्ष प्रारंभ हुआ, वह जे. ई की पोस्ट पर कार्यरत थे,, हप्ते में एक दिन रविवार का अवकाश रहता था तब गाँव-गाँव जाकर सत्संग किया करते थे,, किसी भक्त के घर। चूँकि मालिक का ज्ञान भी आगे ले जाना था और कुछ अनुयायी भी बढ़ने लगे तो परमात्मा के आदेशानुसार उन्होंने जे. ई की नोकरी से त्यागपत्र दे दिया,, इसके उपरांत नगर-नगर सत्संग किया कि संख्या में श्रदालु भी बढ़ने लगे साथ साथ काफी विरोध भी हुआ,, लेकिन सत्यज्ञान नही रुका आगे चलकर 2006 में करोंथा आश्रम की स्थापना की । संत जी ने महृषि दयानंद की पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश की अज्ञानता का प्रर्दापास किया और सच्चाई को बताया जिससे आर्य समाजी संत जी के विरोधी ही गए। और संत जी को खत्म करने को उतारू हुए और अंत करोंथा कांड करा, अनेक झूठे बेबुनियाद मुकदमे लगाए पर यह सत्यज्ञान नही रोक पाए नए आश्रम बरवाला की स्थापना की और फिर से सत्यज्ञान प्रारम्भ किया,, विरोधियो की वही गतिविधियां रही और 2014 में फिर बरवाला कांड हुआ और अनेक झुटे मुकदमे लगाए,,और जेल भेज दिया, लेकिन लाखो श्रदालुओ का विश्वास अब भी नही डगमगा और अब भी हमारा संघर्ष जारी है अंनत सत्यज्ञान सत्यराह की विजय होगी, और गुनहगार कटघरे में होंगे।।




अधिक जानकारी के लिए देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 तक।। 
पढे पुस्तक ज्ञान गंगा जीने की राह।

Wednesday, July 8, 2020

नवरात्री पूजा

क्या है नवरात्रि पूजन
यह हिन्दुओ का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है जिसे वे हर वर्ष बड़े हर्ष उल्लास के साथ 10 दिन तक मानते है।
यह देश के कोने कोने में मनाया जाता है।
इन दिनों में देवी दुर्गा की पूजा अर्चना होती है। और कई लोग इन दिनों में उपवास भी रखते हैं।
व कुछ लोग कलश स्थापना करते है । सामान्य भाषा में इसे नोराते कहते है जिसमे 9 दिन तक विभिन्न देवियो की पूजा होती है।
देवी दुर्गा के विभिन्न रूप जैसे शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी चन्द्रघण्टा आदि की पूजा अर्चना होती है।


अंतिम 10 दिन में मा दुर्गा की विदाई और मूर्ति विसर्जन होगा।।

नवरात्रि क्यो मनाते है।
इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं है कुछ लोग देवी पुराण का हवाला देते है कुछ और। साल में नवरात्रे 4 बार होते है जिसमे साल में 2 बार मुख्य होते ही है।
साल के प्रथम मास चैत्र में पहली नवरात्र होती है, फिर चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्र पड़ती है। इसके बाद अश्विन माह में में प्रमुख शारदीय नवरात्र होती है। साल के अंत में माघ माह में गुप्त नवरात्र होते हैं। इन सभी नवरात्रों का जिक्र देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। हिंदी कैलेंडर के हिसाब से चैत्र माह से हिंदू नववर्ष की भी शुरुआत होती है, और इसी दिन से नवरात्र भी शुरू होते हैं, लेकिन सर्वविदित है कि चारों में चैत्र और शारदीय नवरात्र प्रमुख माने जाते हैं। एक साल में यह दो नवरात्र मनाए जाने के पीछे की वजह भी अलग-अलग तरह की है।


देवी पुराण के अनुसार दुर्गा पूजा सही है या गलत

देवी भागवत पुराण के स्कंद 7, पृष्ठ 562 मे देवी द्वारा हिमालय राज को ज्ञान उपदेश मे दुर्गा जी स्वयं किसी और भगवान की पूजा करने की बात करती हैं।
अब यहां यह साफ तौर पर स्पष्ट है कि इन विद्वानों, संतो के जगदंबिका की पूजा अर्चना के बारे में वर्णित कथन को देवी दुर्गा के श्रीमद् देवी भागवत पुराण के स्कंद 7, पृष्ठ 562 मे कहे गये कथन गलत साबित करते है जहा देवी दुर्गा कहती हैं कि मेरी पूजा को भी त्याग दो और सब बातों को छोड़ दो, केवल ब्रह्म की साधना करो।
इससे ये प्रमाणित है कि सतयुग के "वृहत संतों" को भी परमेश्‍वर के बारे में कोई जानकारी नहीं थी ।

और अधिक आद्यात्मिक जानकारी के लिए देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 बजे तक।

Wednesday, July 1, 2020

उच्च शिक्षा के फायदे और नुकसान

उच्च शिक्षा के फायदे या नुकसान

उच्च शिक्षा सामान्य तौर पर सबको दी जाने वाली शिक्षा
से ऊपर किसी विशेष विषयो पर दी जाने वाली शिक्षा उच्च शिक्षा है। यह शिक्षा के उस स्तर का नाम है जो विश्वविधालयो महाविधालियो द्वारा दी जाती है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा से यह ऊँचा स्तर है जो एच्छिकता पर निर्भर करता है।
यह शिक्षा का तृतीय स्तर है। इसके अंदर स्नातक परास्नातक वह व्यावसायिक एवं प्रशिक्षण आते है।


उच्च शिक्षा के लाभ 

बेहतर नौकरी मिलती है

हमारे देश में अधिकतर लोग जो उच्च शिक्षा लेते हैं उनका पहला लक्ष्य बेहतर नौकरी पाना होता है। साधारण स्नातक लोगों की तुलना में उच्च शिक्षित अभ्यर्थियों को अधिक महत्व दिया जाता है। नौकरियों में प्राथमिकता दी जाती है।

खुद का बिजनेस स्थापित करना

उच्च शिक्षा लेने का एक बड़ा कारण यह भी है कि सकुछ लोग खुद का बिजनेस स्थापित करना चाहते हैं। इसलिए भी वे उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। देश में कई इंजीनियर खुद की अपनी फैक्ट्री लगा देते हैं। कॉमर्स से पढ़ने वाले बहुत से स्टूडेंट्स अपनी खुद की फर्म खोल लेते हैं। डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाले बहुत से डाक्टर अपना खुद का निजी अस्पताल खोल देते हैं।


उच्च शिक्षा में बदलाव
  • इंजीनियरिंग, चिकित्सा तथा कानून के लिये वर्तमानं में स्थापित बहु नियामक संस्थाओं द्वारा भविष्य में निभाई जाने वाली भूमिका उन प्रमुख समस्याओं में शामिल हैं जिनका समाधान करना आवश्यक है। यशपाल समिति ने इन सभी को एक समिति के अंतर्गत लाने का सुझाव दिया था। 
  • इसके साथ ही अन्य पेशेवर संस्थानों जैसे- आर्किटेक्चर तथा नर्सिंग को भी इसमें शामिल किये जाने की आवश्यकता है। 
  • इसका लक्ष्य प्रत्येक वर्ग के लिये पाठ्यक्रमों में परिवर्तन करने और प्रत्येक विषय के  अध्ययन को प्रोत्साहित करने की पर्याप्त स्वायत्तता के साथ अकादमिक मानक निर्धारित करना होना चाहिये। 

धनतेरस के फायदे

क्या है धनतेरस संपादित करें कार्तिक  माह (पूर्णिमान्त) की  कृष्ण पक्ष  की  त्रयोदशी  तिथि के दिन  समुद्र-मंन्थन  के समय  भगवान धन्वन्तरि  अम...