Tuesday, May 12, 2020

भक्ति और नास्तिकता का भेद।

भक्ति

भक्ति का सीधा अर्थ है, सेवाभाव या भजना आपकी जिस इष्ट में रुचि है, उस पर आसक्त होना, भक्ति ही अमृतस्वरूप है, जिससे साधक को अपने कर्म अकर्म का ज्ञान होता है, अपने जीवन निर्वाह के उद्देश्य का ज्ञान होता है, अपने कर्तव्य का ज्ञान होता है।
अतः भक्ति का सीधा अर्थ अपने ईश्वर के प्रति अथाह प्रेम उसको उनके प्रति व्यक्त करना।


भक्ति की आवश्यकता
विशेषतौर पर भक्ति की आवश्यकता है, इस संसाररूपी भवसागर से पार होना अर्थात पूर्ण मोक्ष को प्राप्त करना, पूर्ण मोक्ष हेतु साधक को सच्चे गुरु और उसके प्रमाणित गुरु मंत्रो उसकी दीक्षा की आश्यकता होती है,, पूर्ण गुरु से उपदेश के उपरांत सच्चे परमेश्वर की भक्ति से साधक को सर्व लाभ होते है, और आजीवन भक्ति से अमृत्व (मोक्ष) प्राप्त होता है ।



नास्तिकता
नास्तिकता का सीधा अर्थ है, संसार को ईश्वर रहित मानना,
समस्त सद्ग्रन्थों में ईश्वर के साक्ष्य प्रमाणों को देखकर भी उसके अस्तित्व को अस्वीकार करना।
नास्तिक लोगो का मानना है कि अपना कर्म करो और खाओ उन्होंने सांसारिक भोगो को ही अधिकतर महत्व दिया है,  उन्हें मूल अमृत्व (मोक्ष) की परवाह नही।

अधिक जानकारी के लिए आप नित्य देखे साधना tv शाम 7:30 से 8:30 तक ।।।





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